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रविवार, 11 जुलाई 2021

7 Principles of Social Work,part-B

7 Principles of Social Work ,MSW-4
7 Principles of Social Work-B


7 Principles of Social Work/ 
 समाजकार्य के ७ सिद्धांत :- 
(part-B)

नमस्कार दोस्तों, समाजकार्य को हिन्दी भाषा मे अनुवादित कर भारत के ज्यादा से ज्यादा BSW, MSW, SET-NET अभ्यर्थी इसका फ्री में  लाभ उठा सके यही इस Blog writing का उद्देश्य  है ...! तथा Social Service को Social Work के Skill & Tool के साथ करने में  ये ब्लॉग समाज सेवीओं की  मदत करेगा ! 

(4) आत्मनिर्णय का सिद्धांत/
Principles of self-determination

     
       व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व विकास के लिए स्वयं निर्णय लेने में सक्षम होने की आवश्यकता होती है। सोशलवर्क service मे समस्याग्रस्त व्यक्ति को अपने निर्णय लेने के लिए सशक्त किया जाता है। उसे अपनी जिम्मेदारियों से अवगत कराया जाता है।
        सामाजिक कार्यकर्ता ने अपने क्लायंट को स्वतंत्र और सामान्य तरीके से सोचने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें अपने समस्या जड़ित मुद्दे और स्थिति पर विचार करके निर्णय लेने के लिए तैयार करना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता ने अपने क्लायंट को मुद्दों से संबंधित उपकरणों से अवगत कराना चाहिए। ताकि वह सक्षम होकर सही तरीके से और जल्द  गति से स्वयं निर्णय प्रक्रिया मे प्रगति कर सके।
        समाज कार्य का यह सिद्धांत सेवार्थी के आत्म निर्णय के अधिकार पर बल देता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए सर्वोत्तम का चयन करने का अधिकार होता है। इस दिशा में यह सिद्धांत हमें मार्गदर्शन करता है।
         समाज कार्य के इस सिद्धांत का यह कहना है कि कार्यकर्ता सेवार्थी को समस्या समाधान के प्रत्येक पद पर आत्म निर्णय का अधिकार देता है। तथा कभी भी अपने निर्णय को उसके ऊपर आरोपित करने की कोशिश नहीं करता। उसे अपने निर्णय लेने के बारे में पूर्णता: स्वतंत्र अधिकार देता है ।

सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका :-

(1) एक पेशेवर, उत्कृष्ट सामाजिक कार्यकर्ता एसा सहयोग कर्ता होता है, जो किसी समस्या वाले व्यक्ति को उसकी समस्या को हल करने और उसकी गंभीरता को कम करने में मदद करता है,  लेकिन इसका मतलब यह कि सामाजिक कार्यकर्ता क्लायंट के जीवन के सारे निर्णय स्वयं ले। क्लायंट में निर्णय लेने की क्षमता होती है। उसके ऊपर लोगों का बंधन हो सकता है, उसका उत्पीड़न हो रहा हो सकता होगा, उसकी सोचने की क्षमता, उसका जुनून, उसकी कार्यक्षमत, सभी चीजों पर विचार करना होता है।
(2) क्लायंट पर निर्णय थोपने के बजाय, सामाजिक कार्यकर्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह क्लायंट को अपनी समस्या को हल करने और समाधान पाने के लिए प्रोत्साहित करे।
(3) समाज कार्यकर्ता इस सिद्धांत को मानते हुए सेवार्थी को निर्णय लेने की शक्ति को मजबूत करने में सहयोग करता है। विविध संसाधन के बारे में उसे ज्ञात कराता है जिससे वह अपने समस्या के बारे में उचित निर्णय ले सके।

(5) अनिर्णयात्मक मनोवृत्ति/
Non-Judgemental Attitude:
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      सामाजिक कार्यकर्ता के लिए इस Principal को ध्यान में रखना बहोत जरूरी होता है, क्योंकि सामान्य तौर पर हर व्यक्ति को, हर मामले में अपनी राय जल्द ही व्यक्त करने की आदत होती है।पिछले अनुभव के आधार पर किसी पर दोषारोपण करना, उसे कम करके आंकना, बिना जाने उसकी राय बनाना यह सब गलत होता है। सहायक को कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। ऐसे विचारों से सहायक client को स्वीकार नहीं करता और स्वयं न्यायाधीश का तराजू बन जाता है। जिस वजह से client अपनी समस्या खूलकर बोल नहीं पाता, ना ही वह सहायक का स्वीकार करता है। उसे लगता है कि, उसकी परेशानी दूर नहीं होगी। वह झूठी जानकारी भी दे सकता है, तो समस्याएं दूर नहीं होती हैं। बल्कि सहसंबंध भी स्थापित नहीं हो पाते हैं। फिर Counseling की प्रोसेस आगे बढ़ नहीं पाती। इसलिए सहायकने कभी भी स्वयं निर्णय नहीं लेना चाहिए।
      सेवार्थी को संपूर्ण सूनने के पश्र्चयात ही किसी भी नतीजे और उपचार पर पहोंचना चाहिए। यह principal प्रोफ़ेशनल को समस्या के विषय में कोई भी अतार्किक व अवैज्ञानिक निर्णय लेने से रोकता है। जिस लिए इस नियम का पालन प्रोफ़ेशनल ने अवश्य करना चाहिए।

समाजकार्यकर्ता की भूमिका:-

      
 (1) प्रक्रिया के दौरान और बाद में किए जाने वाले सभी निर्णय क्लाइंट में निहित होते हैं। एक सामाजिक पेशेवर की भूमिका इस बात पर ध्यान केंद्रित करना है कि क्या हुआ है, और क्या हो रहा है, इसे समझने के लिए, इसके बारे में जागरूक होना और तटस्थ भूमिका निभाना होता है। कौन दोषी है और कौन बेकसूर है, इसके झांसे में सामाजिक कार्यकर्ता नहीं पड़ते।  
(2) एक कार्यकर्ता के काम का उद्देश्य किसी को आंकना या दोष देना नहीं है, बल्कि तथ्यों को जानकर मदद करना है। इस सिद्धांत का पालन करने वाला एक कार्यकर्ता वस्तुनिष्ठ होने का प्रयास करता है। वह भावनाओं में नहीं आता है न ही बहेता है। इस नियम का सार यह है कि, यह दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता को मान्यता देता है।

(6) Controled Emotional Involvement/ 
नियंन्त्रित संवेगात्मक संबंध :-

       सामाजिक कार्य में व्यक्तिगत मुद्दों पर काम करते समय, सामाजिक कार्यकर्ता व्यक्तिगत स्तर पर सेवार्थी के संपर्क में आता है। समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति उदास, निराश होता है। उसकी भावनाओं के अनुरूप व्यक्त होना महत्वपूर्ण होता है, तभी कार्यकर्ता संवेदनशील दिमाग से समस्या से निपट सकता है।  से्वार्थी के दुख में उसको आधार देने के लिए, प्यार और सहानुभूति के चार शब्द कह देना, इतना ही फर्ज बनता है। लेकिन अगर प्रोफेशनल उनके दुख में रोते रहे, तो सेवार्थी की समस्या छुटने के बजाय स्वयं कार्यकर्ता समस्याग्रस्त बन जाएगा। इसलिए सीमित भावनात्मक निवेश करना महत्वपूर्ण नियम माना गया है।
         यह सिद्धांत कार्यकर्ता को इस बात के प्रति सावधान करता है कि, सेवार्थी की समस्या को देखकर उससे हम व्यक्तिगत एवं भावनात्मक लगाव का अनुभव न रखने लगे। क्योंकि कार्यकर्ता एक व्यवसायिक व्यक्ति है। इस कारण उसे व्यायसायिक प्रक्रिया का पालन संबंध स्थापन के दौरान करना चाहिए। 

Social work Professional की भूमिका:-

(1) कार्यकर्ता को व्यक्तिगत रुप से सेवार्थी की समस्या में लिप्त होने के बजाय स्वयं वस्तुनिष्ठ नजरिए से कार्य करना चाहिए। Social work professional को समस्या के संदर्भ में व्यक्तिगत निर्णय लेने से बचना चाहिए, क्योंकि अधिक सहानुभूति सेवार्थी के आत्म-निर्णय और स्वतंत्रता के अधिकार में हस्तक्षेप कर सकती हैं। 
(2) कार्यकर्ता के लिए ध्यान रखने की बात यह भी है कि, अधिक वस्तुनिष्ठता इस बात की आशंका जताती है कि कार्यकर्ताओं को सेवार्थी की समस्या में रुचि नहीं है। इसलिए समतोल बनते हुए, वस्तुनिष्ठता को अपनाते हुए,  नियंत्रित भावनाओं का सहसंबंध स्थापित करना Social work Professional की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

(7) Purpose fully expression of feelings & Communication/
भावनाओं की उद्देश्यपूर्ण अभिव्यक्ति और संचार:-

      समाजकार्य व्यवसाय में सार्थक संबंध के सिद्धांत का पालन किया जाता है, यह अन्य व्यवसाय में नहीं देखा जाता है।  सामाजिक कार्य के क्षेत्र में अच्छे संबंध बनाना और बनाए रखना व्यवसाय और संचार के लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।  सामाजिक कार्य के हर क्षेत्र में इसे आवश्यक माना जाता है।  सामान्य संबंध सामाजिक संबंध होते हैं जो खुले होते हैं। सेवा खत्म होने तक टीके रहते है।  समाज कार्य व्यवसाय में संबंध तभी समाप्त होते हैं जब समस्या, सेवा, समाप्त हो जाती है।  किसी व्यक्ति के लिए दिया गया श्रम केवल व्यवसाय में प्रतिबद्धता और उस व्यक्ति की जरूरतों को ध्यान में रखकर ही किया जाता है। 
     Client की जरूरतों के आधार पर सहसंबंध बनते हैं। ता की client अपने विचार, भावनाओं को खुलकर रख सके । यह व्यावसायिक संबंध घरेलू संबंधों में प्रतिबिंबित नहीं होते हैं या नहीं होने चाहिए। संबंध स्थापित करने पर ही client अभिव्यक्त हो पाता है। उद्देश्यपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए सहसंबंध बनाना जिसके लिए योग्य  संचार communication होना जरूरी होता है।

समाज कार्यकर्ता की भूमिका:-

(1) समाजकार्य कर्ता को सेवार्थी से संबंध स्थापित करते समय औपचारिक होना चाहिए। Client अपने आपको व्यक्त कर सके उतने ही संबंध स्थापित करने चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता विशिष्ट प्रश्नों पर अपना ध्यान केंद्रित करता होता है। लोकतंत्र के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए आपस में संबंध स्थापित करना सामाजिक कार्यकर्ताओं का दायित्व होता है। 
(2) एक सामाजिक कार्यकर्ता का महत्वपूर्ण कार्य सेवार्थी का स्वीकार करना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना, बोलते समय सामाजिक दृष्टिकोण रखना, सामाजिक व्यवहार करना, सकारात्मक दृष्टिकोण रखना यह होता है।  
(3) समाज कार्यकर्ता client को एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में सभी गुणों के साथ, आहत किए बिना, सम्मान के साथ स्वीकार करता है। इसलिए सामाजिक कार्यकर्ता में उनकी आस्था बनी रहती है। इतना ही नहीं, सामाजिक कार्यकर्ता client के दिमाग में, उसके मन में  क्या चल रहा है, इसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन करता है। एक-दूसरे के साथ संबंध बनाने में ये अहम भूमिका निभाते हैं। ईस प्रकार उद्देश्य पूू्र्ण संबंध स्थापित करनेे को महत्व दिया गया है।

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