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शनिवार, 29 मई 2021

MSW-7 Principles of Social Work-A

MSW

7 Principles of Social work

MSW (master of social work)

7 Principles of Social Work/ 
७ समाजकार्य के सिद्धांत :- (Part-A)

  • समाजकार्य  सिद्धांत का महत्व/आवश्यकताए :-

Importance / Requirement of Social Work Business Principles : -

(1)हर व्यवसाय के कुछ बुनियादी सिद्धांत होते हैं।  

(2)ये सिद्धांत सामाजिक कार्य में एक मार्गदर्शक भूमिका निभाते हैं। 

(3)इन सिद्धांतों को प्रक्रिया(Process) का मौलिक सलाहकार माना जाता है।  

(4)ये सिद्धांत, वे नियम हैं जो कार्यकर्ता के व्यवहार का मार्गदर्शन और सहायता प्रक्रिया कैसी होनी वो बताते है।

(5)सिद्धांतों के ढाँचे का पालन करने की संस्कृति और सामाजिक दबाव के कारण व्यक्ति के व्यवहार को अपने-आप नियंत्रित किया जा सकता है।

(6)एक व्यवसाय के मूल सिद्धांतों का पालन व्यवसाय की गुणवत्ता को बढ़ाता है। 

(7)जो व्यक्ति उनका पालन करता है उसे हमेशा सम्मानजनक व्यवहार मिलता है। 

(8)सिद्धांत जीवन की आचार संहिता होती हैं।

 

समाजकार्य व्यवसाय के प्रमुख 7  सिद्धांत Principles निम्नलिखित पेश किए है 

(1) स्वीकृति का सिद्धांत/
principle of acceptance:-

       स्वीकृती अर्थात सेवार्थी से उसकी वर्तमान स्थिति के अनुसार ही व्यवहार करके उसकी परिस्थिति के अनुरूप ही उसके विषय में कोई विचार बनाया जाना चाहिए। जिस स्थिति में भी वह हो उसी स्थिति में उसका स्वीकार किया जाना चाहिए। कार्यकर्ता और सेवार्थी दोनों को एक दूसरे को स्वीकृति प्रदान करनी चाहिए। समाज कार्य में सेवार्थी और और कार्यकर्ता दोनों को एक दूसरे का स्वीकार करना चाहिए। कार्यकर्ता को सेवार्थी की किसी भी नैतिक या अनैतिक किसी भी स्थिति का ध्यान रखें बिना उसे उसकी समस्या के समाधान में सहायता करनी चाहिए। उसके कपड़े अच्छे हैं या नहीं है, उसका बोलने का लहजा उसकी सोच इन सारी बातों का पूर्वाग्रह रख कर समाज कार्यकर्ता अपना कार्य ठीक से नहीं कर सकता। इसलिए उसे निष्पक्षता की भूमिका के साथ सेवार्थी का स्वीकार करना चाहिए। सेवार्थी को विश्वास होगा तभी वह कार्यकर्ता को सहयोग करेगा और इसके लिए उसे एक विशेष प्रक्रिया अपनानी होती है।

     सामाजिक कार्यों में व्यक्ति को जो समस्या है, उसे स्वीकार करना बहुत जरूरी है। सामाजिक कार्य में व्यक्ति को उसकी सभी सीमाओं के साथ स्वीकार किया जाता है। वह कितना करीब-दूर, दोस्त, मेहमान, है वह सब नहीं देखा जाता। केवल व्यक्ति और उसकी गुणवत्ता पर जोर देकर उसका स्वीकार किया जाता है। 

     सेवार्थी को किस बात की समस्या है, केवल उसपर ही ध्यान दिया जाता है। सेवार्थी का समाजकार्य के सिद्धांत स्वीकृति नुसार कार्य नहीं किया तो कई बार समस्याग्रस्त व्यक्ति को कम आका जाता है, उसके साथ बुरा सलूक हो सकता है। उसेही दोषी मान उसकी समस्या अनसूलझी रह जाती है, इसलिए सेवार्थी जिस भी हालात में हो उसे स्वीकृत करना प्रथम सिंद्धात है।

  समाज कार्यकर्ता की भूमिका :- 

(1) समाजकार्य में व्यक्ति को सहाय करने का कार्य होता है इसलिए उससे कार्यकर्ता का संबंध निष्पक्ष होना चाहिए, स्वयं की और सेवार्थी के मूल्य, विचारों का जुड़ना ये बातें गैर होती है। परंतु इन बातों का मतलब यह नहीं की, अपना सर्वस्व छोडके सेवार्थी के हिसाब से व्यवहार करो। 

(2) समाजकार्य में व्यक्ति का स्वीकार किया जाता है, व्यक्ति के अपराधों का नहीं ...!!! ये माना जाता है। "Het the seen not the seener" इसीलिए सेवार्थी  का स्वीकार करना चाहिए !


(2) वैयक्तिकरण का सिद्धांत/
     principle of individualization:-

       प्रत्येक व्यक्ति की एक स्वतंत्र प्रकृति और क्षमता होती है। उसकी अपनी-अपनी राय होती है। हर एक व्यक्ति एक दूसरे से अलग होती हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी की स्थिति अलग होती है। जीवन की घटनाएं और अनुभव अलग होते हैं। एक व्यक्ति का व्यक्तित्व दूसरे के समान हो सकता है। लेकिन वे समान नहीं हो सकते हैं। यह सब उनके पारिवारिक वातावरण और आनुवंशिकता पर निर्भर करता है।

        प्रत्येक व्यक्ति का समाजीकरण विभिन्न स्थितियों में होता है। प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग व्यक्तित्व, प्राथमिकताएं, आदतें, परिवेश, मित्र, रिश्तेदार, सामाजिक स्थिति, आर्थिक स्थिति, परंपराएं, संस्कृति, मूल्य, सपने, महत्वाकांक्षाएं, दृष्टिकोण, व्यक्तिगत सीमाएं, पक्ष आदि होते हैं।  इस सब को ध्यान में रखते हुए किसी के साथ सहयोग करते समय वैयक्तिकरण के सिद्धांत की आवश्यकता होती है। यद्यपि समस्या एक स्थान से दूसरे स्थान पर और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न हो सकती है। समस्या की प्रकृति, सीमा और गंभीरता हर व्यक्ति में भिन्न होती है । समस्या एक जैसी होने पर भी व्यक्ति के अनुसार समाधान बदलना पड़ता है। इस सिद्धांत को वैयक्तिकरण का सिद्धांत कहा जाता है।

        प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार होता है कि वह अपनी रूचि के अनुसार विकास करें। ईस सिद्धांत के अंतर्गत कार्यकर्ता यह स्वीकार करता है कि, प्रत्येक व्यक्ति में कुछ ऐसी योग्यताएं होती है जो दूसरों से मिलती है। फिर भी व्यक्ति की कुछ अद्वितीय विशेषताएं होती हैं जो दूसरों में नहीं पाई जाती है। वैयक्तीकरण का सिद्धांत मानव गरिमा पर आधारित है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमताओं और स्थितियों के आधार पर विशिष्ट होता है। उसकी तुलना किसी अन्य के साथ नहीं की जा सकती। ईस नुसार समाजकार्य प्रत्येक व्यक्ति को विशिष्ट मानता है।

सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका :-

(1) विविध व्यक्तित्वों को अपनाते हुए सामाजिक कार्यकर्ता Client के प्रश्नों पर विचार कर उनकी समस्याओं को हल कर अपेक्षित, संतोषजनक समाधान की योजना बनाने में भूमिका निभाता है| 

(2) Client भले ही परेशानी में हो, भले ही वह मुसीबत में हो, उसके संदर्भ में कुछ संकेतों का पालन किया जाना चाहिए, इसलिए सामाजिक कार्यकर्ता Client के साथ चर्चा करने के लिए एक अलग बैठक की व्यवस्था भी करता है।

(3) समाजकार्यकर्ता अपने मूल्यों को अपने काम में शामिल करता है। वास्तव में, यह किया जाना चाहिए। यही उसका कर्तव्य है। यह उसके काम का हिस्सा है। Client की समस्या आखिर क्या है ?  सवाल यह है कि उसे पता हो या न हो, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता को इसे तटस्थ भाव से स्वीकार करना चाहिए और अगला काम करना चाहिए। Client के साथ काम करते हुए, कार्यकर्ता अपने अनुभव और Client के प्रश्न की प्रकृति को मिलाकर Client के समस्या के करीब जाने की कोशिश करता है

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